Thursday, 23 January 2014

हास्य अभिव्यक्ति पर संकट

                 कुमार विश्वास द्वारा कई वर्षों पहले किये गए मनोरंजक/हास्य प्रदर्शनों पर राजनीती से प्रेरित होकर आज आपत्ति जताना कहाँ तक तर्कसंगत है, क्या यह हास्य/मनोरंजनकर्ता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खुला हमला नहीं है, हास्य/व्यंगकार/मनोरंजनकर्ता के द्वारा किसी शो के दौरान मनोरंजन हेतु कही गयी बातों के निहितार्थ नहीं निकाले जाते, वरना लाफ्टर चैलेन्ज,कामेडी नाइट, कामेडी सर्कस बंद करवाइए, राजू श्रीवास्तव व कपिल शर्मा आदि पर बैन लगवाइए !!!!!
                यदि हमारे नेता 'असहिष्णुता' का परिचय दे रहे हैं और दुष्प्रचार कर रहे हैं तो हमें इसमें सहभागी न बनकर जागरूकता का परिचय देना चाहिए, कुमार विश्वास का केरल से आने वाली नर्सों के लिए 'काली-पीली बहनों' कथन का प्रयोग केवल मनोरंजन के लिए किया गया था, इसे नस्लभेदी या लिंगभेदी टिप्पणी नहीं कहा जा सकता, कविता पाठ के बीच-बीच में वे लोगों का मनोरंजन करने के लिए चुटकुले सुनाते हैं, चुहलबाजियाँ आदि करते हैं, उन्होंने सरदारों पर भी मजाकिया कसीदे पढ़े, अब कहो देश के सारे सिक्ख उनके खिलाफ प्रदर्शन करने लग जाएँ, ऐसे तो राजू श्रीवास्तव जो स्वयं उत्तर प्रदेश की धरा से हैं, प्रदर्शनों के दौरान उनका यूपी बिहार के लोगों को 'भैया' कहना भी नस्लभेदी है!!!!! इस प्रकार के कई उदाहरण हैं, ऐसे तो हास्य-व्यंग की विधा ही समाप्त हो जायेगी,
              कुछ लोग इस वाकये को सलमान रुश्दी, तस्लीमा नसरीन के विवादास्पद साहित्य से जोड़ रहे हैं, जबकि उसमें और मनोरंजक प्रदर्शनों में मूलभूत अंतर है, प्रदर्शन कला साहित्य से अलग विधा है, रुश्दी, नसरीन का साहित्य धर्म पर कटाक्ष करता है, जबकि विश्वास का मनोरंजनात्मक प्रदर्शन किसी धर्म की आलोचना के लिए नही था, विश्वास एक कलाकार हैं,  वे देश ही नहीं पूरी दुनिया में लोगों का मनोरंजन करते हैं, उनके अंदर दर्शकों को घंटों तक बंधे रखने की कला है, वे युवा दिलों की धडकन हैं, युवाओं की उमंगों को जागते हैं, यूँ कहें की वो भारत के युवा ह्रदय सम्राट हैं, हाँ राजनीती एक ऐसा छेत्र है जिसमें व्यक्ति को निष्कलंक होना भी पड़ता है, दिखना भी पड़ता है और वक्त पड़ने पर साबित भी करना पड़ता है, यहाँ मै कुमार विश्वास की राजनैतिक समझ का आकलन नहीं कर रहा,

Wednesday, 22 January 2014

अदालतों की अवहेलना



            आज कल एक तथाकथित बौद्धिक अराजक वर्ग न्यायालय व उसके द्वारा दिए गए निर्णयों की भी अवहेलना करता नहीं थकता और प्रचारित करता रहता है की "न्यायालय अंतिम सत्य नहीं है. वह भी कानून को धता बताकर भीड़तंत्र के लिहाज से फैसले करता है" 
            यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और विधि (कानून) की अवधारणा के बिलकुल विपरीत है, विधि निर्माण सांस्कृतिक परम्पराओं के आधार पर होता है, न्याय सदैव व्यापकता को प्रदर्शित करता है, न्याय की मूलभूत संकल्पना, समाज कल्याण पर ही आधारित है, जब कोई व्यापक सामाजिक/राष्ट्रीय हित की बात आती है तो वहां व्यक्तिगत हित गौड़ हो जाते हैं, 
            कहने का तात्पर्य यह है की ऐसे व्यापक मुद्दों/मुकदमों पर जो राष्ट्रहित/राष्ट्रीय सुरक्षा/सामाजिक हित से जुड़े होते हैं उन पर क़ानून/न्याय/विधिक निर्णय अधिक सामाजिक लाभ और कम सामाजिक हानि के सिद्धांत के आधार पर ही होते हैं, इस पर प्रश्नचिन्ह लगाना वो भी ऐसे देश में जहाँ की आबादी १ अरब २० करोड़ से ज्यादा है, अराजकता और अव्यवस्था को बढ़ावा देना है,

इस बात को मै कई उदाहरणों से स्पष्ट करना चाहूँगा, 
            आरक्षण का ही उदाहरण ले लीजिए इससे व्यक्तिगत हित भले ही प्रभावित हों लेकिन अन्ततः इसमें सामाजिक कल्याण की ही भावना निहित है,
            इसी प्रकार जारकर्म को ले लीजिए इसे लेकर कुछ विचारकों का मत है की हिंदू विवाह अधिनियम में तलाक के प्राविधानोमें ढील देनी चाहिए लेकिन आज भी तलाक दुष्कर है, क्योंकि इससे हिंदू समाज में समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, हो सकता है की तलाक के कठोर नियमों की वजह से कुछ लोगों का जीवन अभिशप्त हो लेकिन इसमें व्यापक समाज कल्याण की भावना अन्तर्निहित है, हिंदू समाज में एकल विवाह की इजाजत दी गयी है तथा विवाह को जन्म-जन्मांतर का साथ बताया गया है, इसी कारण अपवाद स्वरुप ही तलाक और दूसरे विवाह को अनुमति दी गयी है और यदि तलाक के प्राविधानों में ढील दी गयी तो इससे हिंदू समाज का ताना बाना टूट जायेगा, क्यूंकि यदि तलाक आसानी से हुए तो इससे दांपत्य जीवन में अविश्वास का भाव पनपेगा, स्वच्छंदता घर कर जायेगी, फिर यह जन्म जन्मांतर का बंधन ना होकर व्यक्तिगत आकांछाओ की पूर्ति का साधन मात्र बन जायेगा, इसका सबसे ज्यादा प्रभाव दम्पति की संतानों पर होगा जिनका भविष्य अंधकारमय हो जायेगा, सौतेले माँ या बाप से वो प्यार और आत्मानुभूति नहीं मिल पाती जो सगे माँ या बाप से मिलती है जिससे बालक/बालिका का सर्वांगीण विकास(विशेषकर सामाजिक) अवरुद्ध हो जायेगा, पाश्चात्य देशों में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, 
           ऐसा ही उदाहरण वैश्यावृत्ति को लेकर भी है, बार बार ये बहस चलती है की इसे वैधता प्रदान कर देनी चाहिए जिससे मानव तस्करी व अन्य संबद्ध सामाजिक समस्याओं का समधान हो सकता है लेकिन आज भी यह देश में अवैध है, विधिवेत्ता/नीतिनिर्माता वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में यह आकलन करते हैं वैश्यावृत्ति को यदि वैधता प्रदान की गयी तो इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा, क्या इससे समाज को अधिक लाभ होगा या हानि ! जिस दिन देश के विधिवेत्त्ताओं/नीतिनिर्माताओं को लगेगा की वैश्यावृति को विधिक मान्यता से समाज को अधिक लाभ होगा और कम हानि स दिन इससे वैधता मिल जायेगी, 
           ऐसा ही एक और उदाहरण समलैंगिकता के मुद्दे का है, इसे भी अधिक सामाजिक लाभ और कम सामाजिक हानि या अधिक सामाजिक हानि और काम सामाजिक लाभ की कसौटी पर परखा जाता है,

Wednesday, 15 January 2014

रायता बनाते केजरीवाल

             केजरीवाल महोदय कहा करते थे की मैंने इन दोनों पार्टियों भाजपा और कांग्रेस का रायता (केजरीवाल जी द्वारा टीवी चैनलों पर प्रयुक्त शब्द) बनाया हुआ है, हमें आपसे सहमत होना चाहिए, लेकिन साथ ही आपने सम्पूर्ण भारतीय राजनीति विशेषकर दिल्ली की राजनीती का भी रायता बनाकर रख दिया है, एक भगदड़ सा माहौल है, आरोपों प्रत्यारोपों का तूफ़ान सा उमड़ पड़ा है आपकी पार्टी के अंदर भी और बाहर भी, आप पता नहीं क्यों इतनी हड़बड़ी में हैं अरे थोड़ा धैर्य का प्रदर्शन करें, धरना स्थल से तो 'आप'ने अपने आपको अराजकतावादी घोषित कर दिया, पूरे देश की अव्यवस्था/अराजकता को छोडिये, पहले दिल्ली में व्याप्त अव्यवस्था/अराजकता को खत्म कर वहां की जनता को स्थिरता के साथ शुसाशन दीजिए और जनता से किये गए वादों पर अधिक ध्यान दीजिए, 
           और जो आप अपनी पार्टी के लोगों के गलत-सही कामो को न्यायसंगत बताते हैं इस दुश्प्रवृति को जितनी जल्दी हो छोडिये, आपने पहले राखी बिडलान का बचाव किया अब सोमनाथ भारती को बचने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं,  
           'आप' इतने आतिउत्साह (रणनीति के तहत) में हैं की आपने यहाँ तक कह दिया की अब 'आप' और भाजपा की सीधी लड़ाई है, कांग्रेस लड़ाई से बाहर है, 'आप' 300-500 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेंगे , महोदय आप वामदलों और अन्य राज्यों के राजनीतिक दलों को कैसे भूल गए, इससे तो सीधे-सीधे यह प्रतीत होता है की आप केवल भाजपा को चुनौती देना चाहते हैं, इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं हैं, कृपया आम आदमी पार्टी की विचारधारा, दर्शन, नीतियां, दृष्टी, राय स्पष्ट करें, नहीं तो विभिन्न विचारधाराओं (आम आदमी पार्टी के नेता खुद स्वीकार करते हैं की वो विभिन्न विचारधाराओं से आये हैं ) से 'आप' में शामिल हुए लोग समस्या पैदा करते रहेंगे और 'आप' का 'रायता' बनाते रहेंगे, कृपया अतिशीघ्र 'आम आदमी पार्टी' की विचारधारा, लोकसभा उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया, दर्शन, नीतियां, दृष्टी, राय को संयोजित/स्पष्ट कर जनता के सामने लाने की महती कृपा करें ताकि जनता का 'दही' 'रायता' ना बन सके,
            कृपया 'इक दिल के टुकड़े हज़ार हुए, कोई यहाँ गिरा कोई वहां गिरा' जैसी स्थिति पैदा न करें जैसा की जय प्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और कांशीराम जी के जनांदोलनो से उपजे ये लालू, मुलायम, माया, पासवान इधर उधर(यूपी-बिहार) में फ़ैल कर करते आ रहे हैं साथ ही दोगुनी गति से भ्रष्टाचार, अराजकता, राजनैतिक आस्थिरता पैदा कर इन प्रदेशों को पीछे की ओर ले जा रहे हैं/थे

विवादों में केजरीवाल

         आम आदमी पार्टी के विधायक विनोद कुमार बिन्नी जी भी केजरीवाल जी से खिन्न हैं दोनों एक दूसरे पर झूठ बोलने का आरोप लगा रहे हैं बिन्नी का आरोप है की "जनसमस्याओं से जुड़े मुद्दों की अनदेखी हो रही है पार्टी अपने मूल उद्देश्यों से भटक गयी है, पार्टी में नए आयातित लोगों का बोलबाला होता जा रहा है, केजरीवाल के इर्द गिर्द कुटिल लोगों का बोलबाला है जो उनके कान भरते हैं", जबकि केजरीवाल महोदय यह कह रहे हैं की "बिन्नी मेरे पास पहले मंत्री बनने फिर लोकसभा का टिकेट मांगने आये थे, मैंने मना कर दिया इस कारण वह खिन्न हैं", अरे महोदय जनता के बीच निर्णय कर लीजिए की आप सच बोल रहे हैं या बिन्नी,
         सोमनाथ भारती पर अदालत ने सबूतों से छेड़छाड़ करने की बात कही है, इसके पहले, कानून के जानकर होते हुए भी वह जजो की मीटिंग बुलाने की बात कर चुके हैं, केजरीवाल महोदय अब आप अदालत के निर्णय को गलत बता रहे हैं, कृपया एक बार रेफ्रेंडम करवा लीजिए की सोमनाथ भारती जी को नैतिकता के आधार पर मंत्री पद से इस्तीफ़ा देना चाहिए या नहीं,             
        इसके पहले भी मंत्री राखी बिड्लान पर तथाकथित हमला हुआ था, कार का कांच चिटक गया था, तात्कालिक रूप में इसे किसी ने दलित विमर्श से जोड़ा तो किसी ने महिला विमर्श से, लेकिन बाद में पता चला की एक बच्चे की गेंद से ऐसा हुआ था, उस बच्चे का दावा है की उसने माफी भी मांग ली थी, लेकिन बावजूद इसके, महिला एवं बाल विकास मंत्री होते हुए भी राखी ने सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए रिपोर्ट लिखवा दी फिर वापस भी लेने की कवायद की, पुलिस सूत्र भी राखी की बात को संदेहास्पद बता रहे थे और मंगोलपुरी की जनता भी, लेकिन राखी के बचाव में केजरीवाल जी भी उतर आए, कहा की-"यह मामला बढ़ाना सब काँग्रेस, बीजेपी की साजिश है, बच्चे ने माफी नहीं मांगी, कांग्रेस और बीजेपी कुछ भी करवा सकती है" अरे केजरीवाल महोदय कब तक अपनी जिम्मेदारियों/कमियों का ठीकरा बीजेपी, काँग्रेस के सिर फोड़ेंगे, या तो वह बच्चा न्यूज़ चैनलो पे झूठ बोल रहा था, या फिर राखी और 'आप', और यदि बीजेपी या काँग्रेस बच्चे से ऐसा करवा रही थी तो जो भी इसमे संलिप्त था उसे आपराधिक षड्यंत्र मे बंद करवाते, अब तो सरकार आपकी है, अब किसने रोका था, और हाँ मंगोलपुरी मे रेफ्रेंडम करवाना क्यों भूल गए की "राखी सच बोल रही हैं या वहाँ की जनता", और इस पर भी की "अब वहां की जनता राखी को एमएलए के रूप मे चाहती है या नहीं",
        यह पोस्ट सकारात्मक आलोचना के लिए है, जितनी जल्दबाजी के साथ आम आदमी पार्टी बढ़ना चाहेगी, उतनी उत्सुकता के साथ उसके ऊपर सवाल भी उठेंगे, कृपया इसके राजनीतिक निहितार्थ ना तलाशें, हमे आम आदमी पार्टी से बहुत आशाएँ और उम्मीदें हैं, उसने भारतीय राजनीती के परिदृश्य को बदला है