कुमार विश्वास द्वारा कई वर्षों पहले किये गए मनोरंजक/हास्य प्रदर्शनों पर राजनीती से प्रेरित होकर आज आपत्ति जताना कहाँ तक तर्कसंगत है, क्या यह हास्य/मनोरंजनकर्ता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खुला हमला नहीं है, हास्य/व्यंगकार/मनोरंजनकर्ता के द्वारा किसी शो के दौरान मनोरंजन हेतु कही गयी बातों के निहितार्थ नहीं निकाले जाते, वरना लाफ्टर चैलेन्ज,कामेडी नाइट, कामेडी सर्कस बंद करवाइए, राजू श्रीवास्तव व कपिल शर्मा आदि पर बैन लगवाइए !!!!!
यदि हमारे नेता 'असहिष्णुता' का परिचय दे रहे हैं और दुष्प्रचार कर रहे हैं तो हमें इसमें सहभागी न बनकर जागरूकता का परिचय देना चाहिए, कुमार विश्वास का केरल से आने वाली नर्सों के लिए 'काली-पीली बहनों' कथन का प्रयोग केवल मनोरंजन के लिए किया गया था, इसे नस्लभेदी या लिंगभेदी टिप्पणी नहीं कहा जा सकता, कविता पाठ के बीच-बीच में वे लोगों का मनोरंजन करने के लिए चुटकुले सुनाते हैं, चुहलबाजियाँ आदि करते हैं, उन्होंने सरदारों पर भी मजाकिया कसीदे पढ़े, अब कहो देश के सारे सिक्ख उनके खिलाफ प्रदर्शन करने लग जाएँ, ऐसे तो राजू श्रीवास्तव जो स्वयं उत्तर प्रदेश की धरा से हैं, प्रदर्शनों के दौरान उनका यूपी बिहार के लोगों को 'भैया' कहना भी नस्लभेदी है!!!!! इस प्रकार के कई उदाहरण हैं, ऐसे तो हास्य-व्यंग की विधा ही समाप्त हो जायेगी,
कुछ लोग इस वाकये को सलमान रुश्दी, तस्लीमा नसरीन के विवादास्पद साहित्य से जोड़ रहे हैं, जबकि उसमें और मनोरंजक प्रदर्शनों में मूलभूत अंतर है, प्रदर्शन कला साहित्य से अलग विधा है, रुश्दी, नसरीन का साहित्य धर्म पर कटाक्ष करता है, जबकि विश्वास का मनोरंजनात्मक प्रदर्शन किसी धर्म की आलोचना के लिए नही था, विश्वास एक कलाकार हैं, वे देश ही नहीं पूरी दुनिया में लोगों का मनोरंजन करते हैं, उनके अंदर दर्शकों को घंटों तक बंधे रखने की कला है, वे युवा दिलों की धडकन हैं, युवाओं की उमंगों को जागते हैं, यूँ कहें की वो भारत के युवा ह्रदय सम्राट हैं, हाँ राजनीती एक ऐसा छेत्र है जिसमें व्यक्ति को निष्कलंक होना भी पड़ता है, दिखना भी पड़ता है और वक्त पड़ने पर साबित भी करना पड़ता है, यहाँ मै कुमार विश्वास की राजनैतिक समझ का आकलन नहीं कर रहा,
यदि हमारे नेता 'असहिष्णुता' का परिचय दे रहे हैं और दुष्प्रचार कर रहे हैं तो हमें इसमें सहभागी न बनकर जागरूकता का परिचय देना चाहिए, कुमार विश्वास का केरल से आने वाली नर्सों के लिए 'काली-पीली बहनों' कथन का प्रयोग केवल मनोरंजन के लिए किया गया था, इसे नस्लभेदी या लिंगभेदी टिप्पणी नहीं कहा जा सकता, कविता पाठ के बीच-बीच में वे लोगों का मनोरंजन करने के लिए चुटकुले सुनाते हैं, चुहलबाजियाँ आदि करते हैं, उन्होंने सरदारों पर भी मजाकिया कसीदे पढ़े, अब कहो देश के सारे सिक्ख उनके खिलाफ प्रदर्शन करने लग जाएँ, ऐसे तो राजू श्रीवास्तव जो स्वयं उत्तर प्रदेश की धरा से हैं, प्रदर्शनों के दौरान उनका यूपी बिहार के लोगों को 'भैया' कहना भी नस्लभेदी है!!!!! इस प्रकार के कई उदाहरण हैं, ऐसे तो हास्य-व्यंग की विधा ही समाप्त हो जायेगी,
कुछ लोग इस वाकये को सलमान रुश्दी, तस्लीमा नसरीन के विवादास्पद साहित्य से जोड़ रहे हैं, जबकि उसमें और मनोरंजक प्रदर्शनों में मूलभूत अंतर है, प्रदर्शन कला साहित्य से अलग विधा है, रुश्दी, नसरीन का साहित्य धर्म पर कटाक्ष करता है, जबकि विश्वास का मनोरंजनात्मक प्रदर्शन किसी धर्म की आलोचना के लिए नही था, विश्वास एक कलाकार हैं, वे देश ही नहीं पूरी दुनिया में लोगों का मनोरंजन करते हैं, उनके अंदर दर्शकों को घंटों तक बंधे रखने की कला है, वे युवा दिलों की धडकन हैं, युवाओं की उमंगों को जागते हैं, यूँ कहें की वो भारत के युवा ह्रदय सम्राट हैं, हाँ राजनीती एक ऐसा छेत्र है जिसमें व्यक्ति को निष्कलंक होना भी पड़ता है, दिखना भी पड़ता है और वक्त पड़ने पर साबित भी करना पड़ता है, यहाँ मै कुमार विश्वास की राजनैतिक समझ का आकलन नहीं कर रहा,
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