Wednesday, 22 January 2014

अदालतों की अवहेलना



            आज कल एक तथाकथित बौद्धिक अराजक वर्ग न्यायालय व उसके द्वारा दिए गए निर्णयों की भी अवहेलना करता नहीं थकता और प्रचारित करता रहता है की "न्यायालय अंतिम सत्य नहीं है. वह भी कानून को धता बताकर भीड़तंत्र के लिहाज से फैसले करता है" 
            यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और विधि (कानून) की अवधारणा के बिलकुल विपरीत है, विधि निर्माण सांस्कृतिक परम्पराओं के आधार पर होता है, न्याय सदैव व्यापकता को प्रदर्शित करता है, न्याय की मूलभूत संकल्पना, समाज कल्याण पर ही आधारित है, जब कोई व्यापक सामाजिक/राष्ट्रीय हित की बात आती है तो वहां व्यक्तिगत हित गौड़ हो जाते हैं, 
            कहने का तात्पर्य यह है की ऐसे व्यापक मुद्दों/मुकदमों पर जो राष्ट्रहित/राष्ट्रीय सुरक्षा/सामाजिक हित से जुड़े होते हैं उन पर क़ानून/न्याय/विधिक निर्णय अधिक सामाजिक लाभ और कम सामाजिक हानि के सिद्धांत के आधार पर ही होते हैं, इस पर प्रश्नचिन्ह लगाना वो भी ऐसे देश में जहाँ की आबादी १ अरब २० करोड़ से ज्यादा है, अराजकता और अव्यवस्था को बढ़ावा देना है,

इस बात को मै कई उदाहरणों से स्पष्ट करना चाहूँगा, 
            आरक्षण का ही उदाहरण ले लीजिए इससे व्यक्तिगत हित भले ही प्रभावित हों लेकिन अन्ततः इसमें सामाजिक कल्याण की ही भावना निहित है,
            इसी प्रकार जारकर्म को ले लीजिए इसे लेकर कुछ विचारकों का मत है की हिंदू विवाह अधिनियम में तलाक के प्राविधानोमें ढील देनी चाहिए लेकिन आज भी तलाक दुष्कर है, क्योंकि इससे हिंदू समाज में समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, हो सकता है की तलाक के कठोर नियमों की वजह से कुछ लोगों का जीवन अभिशप्त हो लेकिन इसमें व्यापक समाज कल्याण की भावना अन्तर्निहित है, हिंदू समाज में एकल विवाह की इजाजत दी गयी है तथा विवाह को जन्म-जन्मांतर का साथ बताया गया है, इसी कारण अपवाद स्वरुप ही तलाक और दूसरे विवाह को अनुमति दी गयी है और यदि तलाक के प्राविधानों में ढील दी गयी तो इससे हिंदू समाज का ताना बाना टूट जायेगा, क्यूंकि यदि तलाक आसानी से हुए तो इससे दांपत्य जीवन में अविश्वास का भाव पनपेगा, स्वच्छंदता घर कर जायेगी, फिर यह जन्म जन्मांतर का बंधन ना होकर व्यक्तिगत आकांछाओ की पूर्ति का साधन मात्र बन जायेगा, इसका सबसे ज्यादा प्रभाव दम्पति की संतानों पर होगा जिनका भविष्य अंधकारमय हो जायेगा, सौतेले माँ या बाप से वो प्यार और आत्मानुभूति नहीं मिल पाती जो सगे माँ या बाप से मिलती है जिससे बालक/बालिका का सर्वांगीण विकास(विशेषकर सामाजिक) अवरुद्ध हो जायेगा, पाश्चात्य देशों में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं, 
           ऐसा ही उदाहरण वैश्यावृत्ति को लेकर भी है, बार बार ये बहस चलती है की इसे वैधता प्रदान कर देनी चाहिए जिससे मानव तस्करी व अन्य संबद्ध सामाजिक समस्याओं का समधान हो सकता है लेकिन आज भी यह देश में अवैध है, विधिवेत्ता/नीतिनिर्माता वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में यह आकलन करते हैं वैश्यावृत्ति को यदि वैधता प्रदान की गयी तो इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा, क्या इससे समाज को अधिक लाभ होगा या हानि ! जिस दिन देश के विधिवेत्त्ताओं/नीतिनिर्माताओं को लगेगा की वैश्यावृति को विधिक मान्यता से समाज को अधिक लाभ होगा और कम हानि स दिन इससे वैधता मिल जायेगी, 
           ऐसा ही एक और उदाहरण समलैंगिकता के मुद्दे का है, इसे भी अधिक सामाजिक लाभ और कम सामाजिक हानि या अधिक सामाजिक हानि और काम सामाजिक लाभ की कसौटी पर परखा जाता है,

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